Answer for उद्योग किसे कहते है ?

किसी भी अर्थव्यवस्था का वाहन उद्योग ही उसकी प्रगति की धुरी होता है। यह ही देश के तीव्र आर्थिक एवं औद्योगिक विकास में महत्त्वपूर्ण ही देश में ऊर्जा व रेल तथा सड़क परिवहन सम्बन्धी संरचना (infrastructure) सुविधाओं के विकास में भी सहायक होता है। अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र से इसके गहन अग्रगामी और पश्चगामी जुड़ावों के कारण उद्योग का मजबूत और बहुगुणित प्रभाव देश की प्रगति में होता है। इस उद्योग से मोटरगाड़ी एवं वाहन पुर्जी सम्बन्धी सेक्टर जुड़े होते हैं। इस उद्योग में यात्री गाड़ियाँ, मध्यम और भारी व्यावसायिक वाहन, बहुउपयोगी वाहन; जैसे-जीप, स्कूटर, मोटर साइकिलें व ट्रैक्टर आदि; एवं वाहन पुर्जे; जैसे कि-इंजन के भाग, ड्राइव व संचरण भाग तथा सस्पेन्शन भाग आदि; आते हैं। भारत में पिछले कुछ वर्षों में इस उद्योग ने प्रभावी उन्नति दर्ज की है। वर्तमान में भारत दुनिया का दसरा सबसे बड़ा दपहिया वाहन निर्माता है और पाँचवाँ सबसे बड़ा व्यावसायिक यात्री वाहन निर्माता होने के साथ ही सबसे बड़ा टैक्टर निर्माता भी है। भारत में वाहन उद्योग विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा वाहन उद्योग है, जिसने वर्ष 2009 में 26 लाख इकाइयों का उत्पादन किया। वर्ष 2009 में जापान, दक्षिण कोरिया और थाइलैण्ड के बाद भारत एशिया का चौथा सबसे बड़ा वाहन निर्यातक बन गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत की सड़कों पर 61.1 करोड़ वाहन होंगे जो विश्व में सर्वाधिक वाहन संख्या होगी। यह अध्याय आपके समक्ष इस उद्योग सम्बन्धी कुछ अत्यन्त महत्त्व की जानकारियाँ/सूचनाएँ प्रस्तुत करेगा जो प्रत्येक स्तर पर आपकी सहायता करेंगी।

इतिहास History
सर्वप्रथम 1769 ई. में एक फ्रांसीसी कैप्टन निकोलस जोजेफ ने स्वत: चलने वाली तीन पहियों वाली गाड़ी का आविष्कार किया था। 1805 ई. में एक अन्य इंजीनियर आलीवार ऐवान ने एक चार पहियों वाली मोटरगाड़ी बनाई। 1880 ई. में जर्मन तथा फ्रांसीसी इंजीनियरों ने इन्टर्नल कम्बशन इंजन (internal combustion engine) का डिजाइन बनाया जिसका सुधरा रूप अब देखने को मिलता है। 1885 ई. में एक जर्मन इंजीनियर बेन्ज ने पुन: तीन पहियों की स्वत: चलने वाली गाड़ी बनायी जिसमें इन्टर्नल कम्बशन इंजन का प्रयोग किया गया था। 1886 ई. से वर्ष 1906 तक जर्मन, फ्रांस, अमेरिका तथा इंग्लैण्ड आदि देशों के बहुत से वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों ने मोटरगाड़ी के डिजाइन को विकसित करने के अथक प्रयास किये जिसमें उन्हें पूर्ण सफलता मिली। वर्ष 1909 में पूर्ण व्यावसायिक स्तर पर मोटरगाड़ियाँ प्रतिवर्ष बनाने का संकल्प अमेरिका के सर हेनरी फोर्ड ने किया। फोर्ड ने अपनी ‘फोर्ड मोटर कम्पनी’ की स्थापना की जिसमें 20,000 मोटरगाड़ियाँ प्रतिवर्ष बनाने का लक्ष्य रखा गया। इसी कारण मोटरगाड़ियों को प्रसिद्ध करने का श्रेय फोर्ड मोटर को दिया जाता है। भारत में वाहन उद्योग की शुरूआत 1940 के दशक में हुई। स्वतन्त्रता-प्राप्ति से पूर्व अधिकतर मोटरगाड़ियाँ अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा आदि देशों से आयात होती थीं। भारत में इनका निर्माण नहीं होता था, परन्तु वर्ष 1943-44 में हिन्दुस्तान मोटर्स, बम्बई तथा प्रीमियर ऑटोमोबाइल कम्पनी, कलकत्ता को भारत में मोटरगाड़ी बनाने की अनुमति तत्कालीन शासन ने दे दी थी। वर्ष 1947 में आजादी के बाद, वाहन उद्योग को आपूर्ति करने के लिए, भारत सरकार और निजी क्षेत्र द्वारा वाहन के कल-पुर्जी के निर्माण हेतु उद्योग लगाने के प्रयास किए गए। हालाँकि राष्ट्रीयकरण और निजी क्षेत्र के विकास में बाधा डालने वाले लाइसेन्स राज के कारण तुलनात्मक रूप से 1950 और 1960 के दशक में इस उद्योग की वृद्धि दर धीमी रही, लेकिन वर्ष 1970 के बाद, वाहन उद्योग ने विकास करना आरम्भ किया, परन्तु यह विकास मुख्य रूप से ट्रैक्टरों, व्यावसायिक वाहनों और स्कूटरों के निर्माण में लक्षित हुआ। कारें अब भी बड़ी विलासिता की वस्तु बनी रहीं। जापानी वाहन निर्माताओं ने भारतीय बाजार में प्रवेश के प्रयास किए और आखिरकार भारत में मारुति उद्योग की स्थापना हुई। अनेक विदेशी फार्मों ने भारतीय कम्पनियों के साथ संयुक्त उद्यमों की स्थापना की। 1980 के दशक में, कई जापानी निर्माताओं ने मोटर साइकिलों एवं हल्के व्यावसायिक वाहनों के उत्पादन हेतु संयुक्त उद्यमों की स्थापना की। इसी समय भारत सरकार ने सुजुकी को छोटी कारों के निर्माण हेतु संयुक्त उद्यम स्थापित करने हेतु चुना। वर्ष 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण के बाद और साथ ही लाइसन्स राज के धीरे-धीरे कमजोर होने पर कई भारतीय एवं बहराष्ट्रीय कार कम्पनियाँ भारतीय बाजार में उतरीं।

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