Answer for टो-इन तथा टो-आउट किसे कहते है ?

यदि किसी गोल चपटी वस्तु को कुछ तिरछा करके लुढ़काया जाए, तो वह बाहर की ओर को घूमते समय मुड़ जाएगी। इसी प्रकार ट्रैक्टर के अगले पहियों में जब कैम्बर रखा जाता है, तो उनके झुकाव के कारण पहियों में बाहर की ओर भागने की क्रिया होने लगती है। इससे स्टीयरिंग को बीच में रखना कठिन हो जाता है। उसे रोकने के लिए पहियों में टो-इन दिया जाता है। यदि अगले पहियों को आगे की ओर से देखा जाए तो उनके अगले सिरे (toe) अन्दर की ओर घूमे हुए दिखाई देते हैं तथा पिछले हिस्से बाहर की ओर फैले रहते हैं। इसमें अगले सिरों की दूरी B है तथा पिछले सिरों की दूरी A है। इसे देखने से ज्ञात होता है कि A की अपेक्षा B की दूरी अधिक है। इन दोनों दूरियों के अन्तर को टो-इन कहते हैं। यह 2 मिमी से 5 मिमी तक होता है। इसे टाई रॉड एण्ड की सहायता से रखा तथा व्यवस्थित किया जाता है। इससे अगले दोनों पहिये एक-दूसरे के समान्तर चलते हैं, स्टीयरिंग में स्थिरता आती है। पहिये साइड से स्लिप नहीं करते हैं तथा टायर कम घिसते हैं। मार्ग के झटके भी कम महसूस होते हैं। ये पहिये चलते समय सीधे रहते हैं। ट्रैक्टर मोड़ते समय फ्रेम के साथ अगले दोनों पहियों के कोणों के अन्तर को टो-आउट कहा जाता है। स्टीयरिंग सिस्टम इस प्रकार डिजाइन किया जाता है कि ट्रैक्टर मोड़ते समय अन्दर का पहिया अधिक कोण बनाता है। इसके विपरीत बाहरी पहिया कम कोण बनाता है। इसी कारण मोड़ते समय पहिये टो-आउट रहते हैं। उदाहरण के लिए यदि अन्दर का पहिया 23° तथा बाहरी पहिया 20° का कोण बनाता है, तो इसमें 23° – 20° =3° टो-आउट है।। उपरोक्त चारों को नापने के लिए अलग-अलग प्रकार के गेज आते हैं, जिन्हें व्हील एलाइनमेन्ट गेज सेट कहा जाता है। जब कभी भी व्हील एलाइनमेन्ट चैक करें तो चारों चीजों को चैक करके सही प्रकार व्यवस्थित करना चाहिए, क्योंकि किसी-न-किसी प्रकार ये सब एक-दूसरे से प्रभावित अवश्य होती हैं। एक के कम या अधिक होने से सम्पूर्ण स्टीयरिंग पर उसका प्रभाव पड़ता है।

ट्रैक्टर की चेसिस Chassis of Tractor
ट्रैक्टर की चेसिस तीन मजबूत हिस्सों को जोड़कर बनाई जाती है ये निम्न हैं

इंजन Engine
इंजन के सिलेण्डर ब्लॉक को ही इस प्रकार बनाया जाता है कि यह कृषि कार्य करने से लगने वाले झटकों को सहन कर सके। आगे की ओर से इसे कास्टिड फ्रेम से फ्रण्ट एक्सेल से जोड़ा जाता है, पीछे से क्लच हाउसिंग को गियर बॉक्स हाउसिंग से बोल्टों द्वारा जोड़ा जाता है।

क्लच हाउसिंग Clutch Housing
कुछ ट्रैक्टरों में यह, सिलेण्डर ब्लॉक में ही ढाला जाता है, परन्तु किन्हीं में अलग से फिट किया जाता है।

गियर बॉक्स हाउसिंग Gear Box Housing
गियर बॉक्स के हाउसिंग को भी काफी मजबूत कास्ट आयरन में ढाला जाता है, क्योंकि यह ट्रैक्टर के बीच का हिस्सा होता है। इसके पीछे डिफरैन्शियल लगाया जाता है। डिफरैन्शियल के दोनों ओर रीयर एक्सेल ट्यूब लगाकर पहिये फिट किए जाते हैं। इस प्रकार ट्रैक्टर का निर्माण बिना चेसिस-फ्रेम के हो जाता है। कुछ पुराने ट्रैक्टरों-इण्टरनेशनल, बाई लार्स में चेसिस प्रयोग होती थी, ट्रैक्टर की इस प्रकार फ़िटिंग से इसे इसके आकार-प्रकार से ही पहचाना जाता था, इसीलिए इनकी स्पीड में मोटर की अपेक्षा अन्तर होता था, क्योकि इसकी कार्यक्षमता मोटर से अधिक होती थी, परन्तु ट्रैक्टर के गियरों का अनुपात उससे अधिक होता था, जिससे ट्रैक्टर की स्पीड कम व कार्यक्षमता बढ़ी हुई होती थी। ट्रैक्टरों में चेसिस-फ्रेम केवल चेन टाइप ट्रैक्टरों में होता है, क्योंकि इनकी कार्यक्षमता व्हील टाइप ट्रैक्टरों से कहीं अधिक होती है। इसी क्षमता के कारण चेन टाइप ट्रैक्टरों की स्पीड इनसे भी कम होती है। इसके अनुसार ही चेन टाइप ट्रैक्टरों में काफी अन्तर भी होता है। इस प्रकार चेन टाइप ट्रैक्टरों में फ्रेम पर निम्न फिटिंग लगाई जाती है रेडियेटर, इंजन, गियर बॉक्स, डिफरैन्शियल, ड्रिबिन व्हील, आइडलर व्हील एवं हाइड्रॉलिक ऑयल ट्रैक। इसका उपयोग भिन्न-भिन्न प्रकार के अन्य उपकरणों; जैसे- डोजर, एंगल डोजर क्रेन आदि, कुछ बड़े चार पहियों वाले डोजर्स में भी किया जाता है, जिससे अधिक ऊबड़-खाबड़ वाली जगहों पर कार्य लिया जाता है, क्योंकि इनका ग्राउण्ड क्लीयरैन्स (ground clearance) चेन टाइप ट्रैक्टरों से अधिक होता है।

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