Answer for व्हील एलाइनमेन्ट किसे कहते है ?

रेक्टर का स्टीयरिंग हल्का रहे, तेज चाल में भी ट्रैक्टर सरलता से कण्ट्रोल किया जा सके, व्हील बबलिंग न हो अथवा उसका प्रभाव स्टीयरिंग पर न पड़े, अगले टायर शीघ्र न घिसें तथा पहिये स्वयं सीधे नियन्त्रित रहें, इसके लिए अगले पहियों में फिटिंग के साथ कुछ कोण भी दिए जाते हैं। इन कोणों को ही व्हील एलाइनमेन्ट कहते हैं। इसके अन्तर्गत चार कोण होते हैं कैम्बर कोण

कैम्बर कोण Camber Angle
यदि ट्रैक्टर के अगले पहियों को सामने से ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो वे ऊपर की ओर से कुछ बाहर की ओर झुके रहते हैं तथा नीचे का हिस्सा अन्दर की ओर रहता है। यह झुकाव स्टब एक्सेल में रहता है। स्टब एक्सेल का तली की ओर के इस झुकाव से जो कोण बनता है, वह कैम्बर कोण कहलाता है। यदि पहिये के मध्य बिन्दु से एक लम्बवत् रेखा खींचे और उसी बिन्दु से पहिये के दो भाग करती हुई एक दूसरी रेखा खींचे तो इन रेखाओं द्वारा बना कोण कैम्बर की डिग्री दर्शाएगा। यह कोण 2′ से 5° तक दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप स्टीयरिंग हल्का घूमता है, क्योंकि ट्रैक्टर का अधिकतर भार स्टब एक्सेल के अन्दर वाले बियरिंग पर ही पड़ता है। यदि यह झकाव न रहे. तो भार पडने पर पहिये अन्दर की ओर झुकेंगे, जिससे उनका एक किनारा शीघ्र घिस जाएगा। यदि यह कोण किसी चित्र कैम्बर एंगल एवं किंग पिन का झुकाव कारणवश कम या अधिक हो गया है, तो इसे व्यवस्थित कर लेना चाहिए। कैम्बर एंगल दो प्रकार का होता है 1. पॉजिटिव कैम्बर (Positive Camber) तथा 2. निगेटिव कैम्बर (Negative Camber)| पॉजिटिव कैम्बर में पहियों का झुकाव ऊपर से बाहर की ओर रहता है। इसी प्रकार की फिटिंग अधिकतर ट्रैक्टरों में रहती है, परन्तु कुछ ट्रैक्टरों में इसके विपरीत पहियों को ऊपर से अन्दर की ओर झुकाया जाता है। इस प्रबन्ध को निगेटिव कैम्बर कहते हैं।

कैस्टर कोण Caster Angle
पहियों को ट्रेलिंग एक्शन प्रदान करने तथा उनमें सीधे चलने की प्रवृत्ति बनाए रखने के लिए कैस्टर कोण दिया जाता है। यह कोण किंग पिन में होता है, जिसे कैस्टर पैड तथा शिम की सहायता से दिया जाता है। यदि किंग पिन को ट्रैक्टर की एक साइड में देखा जाए तो किंग पिन का ऊपरी भाग ट्रैक्टर के पीछे की ओर झुका दिखाई पड़ता है। किंग पिन के मध्य बिन्दु से यदि लम्बवत् रेखा खींची जाए तो उसी बिन्दु को स्पर्श करती किंग पिन को दो भागों में विभाजित करती है। एक दूसरी रेखा खींची जाए तो इन रेखाओं से जो कोण बनता है, वह कैस्टर कोण (caster angle) कहलाता है। यह कोण 3° से 5° तक रहता है। इस झुकाव से पहियों में बबलिंग नहीं होती। वे स्वत: सीधे चलते हैं। स्टीयरिंग को घुमाने के बाद स्टीयरिंग व्हील अपने स्थान पर स्वयं आने लगता है, जिससे ट्रैक्टर नियन्त्रित करना आसान हो जाता है। यदि दोनों पहियों में एकसमान कैस्टर कोण नहीं होगा, तो ट्रैक्टर एक ओर भागेगा। इसे व्यवस्थित कर देना चाहिए। कैस्टर कोण के कारण भार टायर के केन्द्र से कुछ आगे कैस्टर कोण के अनुसार ही रहता है। अत: भार के होने पर भी स्टीयरिंग सरलता से घुमाया जा सकता है। कैस्टर कोण के लाभ की प्रवृत्ति दैनिक उपयोग में भी देखी जा सकती है। चिकित्सालय के फर्नीचरों में कैस्टर व्हील प्रयोग किए जाते हैं। इनके प्रयोग से जिस दिशा में उसको धकेला जाता है, उसके सभी कैस्टर व्हील स्वत: उस सीध में हो जाते हैं। इसी प्रकार कैस्टर साइकिल के अगले चिमटे में दिया जाता है, जिससे साइकिल का हैण्डल सरलता से घूमने के साथ-साथ पहिये को सीधा रखने में भी सहायता करता है तभी तो अच्छी साइकिलों को कुछ चालक बिना हैण्डिल पकड़े चला सकते हैं।

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