Answer for Dream-like beauty क्या होता है ?

कमख्आब का अर्थ ही यह होता है – ‘स्वप्न सदृश सौंदर्य’। इसके नाम से इस वस्त्र की सुन्दरता का अनुमान लगाया जा सकता है। इन वस्त्रों में सोने चांदी के चमकदार तारों के प्रयोग के द्वारा जब बेल बूटे बनाए जाते थे तो देखने वाले उसकी सन्दरता को देख कर दांतों तले उंगली दबा लेते थे। अर्थात वस्त्र की उल्टी साइड में कॉटन या सिल्क ही होता था और ऊपर की सीधी साइड में सोने चांदी से बना हुआ बेल बूटा या डिजाइन। नीचे की ओर सिल्क की वीविंग इसलिए आवश्यक होती थी ताकि शरीर पर सोने चांदी की खरोचें न लगें। वस्त्र पहनने पर शरीर में तकलीफ महसूस न हो। ये वस्त्र सोने चांदी के कारण बहुत मंहगे ही होते थे। उनका प्रयोग या तो राजघरानों में या धनिकवर्ग ही करता था। स्वप्न से भी किसी अर्थ में इसका सौन्दर्य कम अनुभव न हो सके, इसीलिए इसका नाम कमख्आब रखा गया। इसका बहुप्रचलित . नाम खीमख्आब भी है।
 
वफ्त अथवा पाटथान :
इस वस्त्र से भी लंहगे, अचकन, अंगरखे आदि बनाए जाते थे। इनमें भी सिल्क धागों के साथ सोने चांदी के नमूने उकेरे जाते थे। रंगीन सिल्क धागों में सोने चांदी की चमक अद्वितीय होती थी।
 
आव-ए-श्बां :
अर्थात “बहता पानी”, इन वस्त्रों को नाम दिया गया था। इसकी डिज़ाइनिंग इस प्रकार से बनाई जाती थी कि सिल्क में सोने चांदी का मानो बहाव हो रहा हो। इसी लिए बहता पानी से सम्बोधित किया गया।
 
हिमरस तथा अमरस :
हिमरस गर्मियों में पहना जाने वाला वस्त्र था क्योंकि यह कॉटन के साथ मिलाकर बनाया जाता था। गर्मियों में ठंडक देने के उद्देश्य से ही इसको कॉटन के साथ मिलाकर बनाते थे। जब कि अमरस को सिल्क के साथ बनाया जाता था। इसकी वीविंग फ्लोटिंग स्टाइल में जहां सिल्क के धागे उल्टी ओर को रह जाते थे जिससे वस्त्र फूला-फूला सा लगता था और सोने चांदी के तारों की खरोंच स्किन (Skin) पर नहीं लगती थी। आजकल भी हैदराबाद में ऐसे वस्त्र बनते हैं किन्तु अब सोने चांदी के स्थान पर सब नकली काम होता है। इसीलिए उसकी झलक पहले की तरह नहीं होती है। प्लास्टिक या स्टील के रेशे बना कर उससे काम किए जाते हैं।

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